ट्रंप ने पीएम मोदी को भेजा न्‍योता, लेकिन क्‍या भारत गाजा पीस बोर्ड में शामिल होगा? विदेश मंत्रालय ने बताया

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नई दिल्ली. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने गाजा पीस बोर्ड में शामिल होने के लिए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को न्योता भेजा है. इतना ही नहीं उन्‍होंने रूसी राष्‍ट्रपत‍ि व्‍लाद‍िमीर पुतिन को भी ऐसा ही न‍िमंत्रण भेजा है. ट्रंप का यह फैसला मिड‍िल ईस्‍ट में भारत की बढ़ती भूमिका का सबूत है. लेकिन जब इस बारे में विदेश मंत्रालय से पूछा गया क‍ि क्‍या भारत की ओर से कोई इसमें शामिल होगा? इस पर विदेश मंत्रालय ने कहा, भारत सरकार ने इस प्रस्ताव पर अभी तक कोई फैसला नहीं लिया है. ये जरूर है क‍ि न्योता मिला है, लेकिन भारत इस पर किसी भी तरह की जल्दबाजी के मूड में नहीं है.

सरकार के उच्च पदस्थ सूत्रों और विदेश मंत्रालय के मुताबिक, भारत इस प्रस्ताव के हर पहलू का बारीकी से अध्ययन कर रहा है. मंत्रालय ने साफ किया है कि हमने न्योता प्राप्त किया है, लेकिन अभी इस पर कोई फैसला नहीं लिया गया है. भारत सरकार का यह रुख कूटनीतिक रूप से बेहद अहम है. मंत्रालय यह समझना चाहता है कि इस बोर्ड ऑफ पीस का स्‍ट्रक्‍चर क्या होगा? क्या यह संयुक्त राष्ट्र के तहत काम करेगा या यह अमेरिका के नेतृत्व वाला एक स्वतंत्र गठबंधन होगा? भारत की विदेश नीति हमेशा से ही किसी दूसरे देश के संघर्ष में सीधे दखल न देने या केवल संयुक्त राष्ट्र के झंडे तले ही शांति मिशन में शामिल होने की रही है. ऐसे में, ट्रंप के इस नए बोर्ड में शामिल होने से पहले भारत उन सभी शर्तों और जिम्मेदारियों को परखना चाहता है जो इस सदस्यता के साथ आएंगी.
60 देशों को भेजा गया है बुलावा
खबर है कि डोनाल्ड ट्रंप ने इस पहल को वैश्विक रूप देने के लिए करीब 60 देशों को न्योता भेजा है. इसमें न केवल पश्चिमी देश, बल्कि ‘ग्लोबल साउथ’ के प्रमुख देश भी शामिल हैं. ट्रंप चाहते हैं कि गाजा का का मैनेजमेंट केवल अमेरिका या यूरोप के हाथ में न रहे, बल्कि इसमें भारत, कजाकिस्तान और यहां तक कि रूस जैसे देशों की भी भागीदारी हो, ताकि इस बोर्ड की विश्वसनीयता बनी रहे.
भारत के सामने क्या है चुनौती?
न्योता सम्मानजनक है, लेकिन भारत के लिए यह फैसला आसान नहीं है. अगर भारत इसमें शामिल होता है, तो उसे गाजा की जमीनी हकीकत और वहां की जटिल राजनीति में सीधा भागीदार बनना पड़ेगा. क्या भारत को वहां अपने अधिकारी या ऑब्‍जर्वर भेजने होंगे? गाजा अभी भी एक अस्थिर क्षेत्र है. किसी भी तरह की हिंसा भड़कने पर बोर्ड के सदस्यों पर जिम्मेदारी आ सकती है. यह एक जोख‍िम है. भारत को यह देखना होगा कि यह बोर्ड किसी एक पक्ष (इजराइल या अमेरिका) के एजेंडे को तो आगे नहीं बढ़ा रहा.