पश्चिम बंगाल में विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) अभियान के बाद मतदाता सूची से करीब 91 लाख नाम हटाए जाने का मुद्दा चुनाव से पहले बड़ा राजनीतिक विवाद बन गया है. निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के अनुसार, यह कुल मतदाता आधार का लगभग 11.85 प्रतिशत है. अंतिम सूची जारी होने से पहले ही 23 अप्रैल को पहले चरण का मतदान होना है, जिससे राजनीतिक बयानबाजी तेज हो गई है.
मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आरोप लगाया कि मतुआ, राजबंशी और अल्पसंख्यक समुदायों को निशाना बनाकर उनके नाम हटाए गए हैं. उन्होंने इसे लोकतांत्रिक अधिकारों पर हमला बताते हुए कहा कि उनकी पार्टी प्रभावित लोगों को कानूनी मदद देगी. वहीं भाजपा नेता शुवेंदु अधिकारी ने दावा किया कि सूची से हटाए गए कई नाम मृत या अपात्र मतदाताओं के थे और प्रक्रिया को त्रुटिरहित बनाने की जरूरत है.
आंकड़ों के मुताबिक, मुर्शिदाबाद, उत्तर 24 परगना और नदिया जैसे जिलों में बड़ी संख्या में नाम हटाए गए. इस बीच मल्लिकार्जुन खरगे ने भी भाजपा पर वैध मतदाताओं के नाम हटाने का आरोप लगाया.
अब सवाल यह है कि जिन मतदाताओं के नाम हटे हैं, क्या वे आगामी चुनाव में अपने मताधिकार का इस्तेमाल कर पाएंगे या नहीं.
‘बीजेपी चाहे जितनी कोशिश कर ले बंगाल नहीं जीतेगी’
समाजवादी पार्टी के अध्यक्ष अखिलेश यादव ने पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की जीत का दावा दोहराते हुए कहा कि भाजपा चाहे जितनी कोशिश और साज़िश कर ले, बंगाल की जनता उसे हराएगी. उन्होंने महिला आरक्षण के मुद्दे पर सवाल उठाते हुए कहा कि मौजूदा जनसंख्या के आधार पर आरक्षण तय होना चाहिए, क्योंकि 2011 के बाद आबादी काफी बढ़ चुकी है.
मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार को लेकर भी उन्होंने चिंता जताई और आरोप लगाया कि चुनाव आयोग अपने दायित्वों में विफल रहा है. उनका कहना था कि आयोग का काम मतदाताओं को जोड़ना है, लेकिन अब ऐसा लगता है कि ध्यान मतदाताओं को हटाने पर है.
अखिलेश यादव ने महंगाई और बेरोजगारी को लेकर भी सरकार पर निशाना साधा और कहा कि चुनाव के बाद हालात और खराब हो सकते हैं. शिक्षामित्रों के मुद्दे पर उन्होंने कहा कि भविष्य में न्याय केवल समाजवादी सरकार ही दिला सकती है.












