इधर एशिया कप में हार, उधर पाक में हाहाकार, PoK में मचा बवाल, पुलिस-सेना के सामने क्यों डटी आवाम?

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भारत-पाकिस्तान के बीच रिश्ते यूं तो दशकों से खराब ही हैं लेकिन पिछले कुछ महीनों से ये तनाव कुछ ज्यादा ही बढ़ा हुआ है. पहलगाम में हुए आतंकी हमले के बाद ऑपरेशन सिंदूर और पाकिस्तान के झूठ पर झूठ ने दोनों देशों को ऐसी जगह लाकर खड़ा कर दिया है, जहां से दोस्ताना रिश्तों की उम्मीद लगभग खत्म ही है. चाहे देश की सरहद हो या फिर क्रिकेट का मैदान, ये तल्खी हर जगह पर दिख रही है. वैसे पाकिस्तान का झूठ और उसकी बेइज्जती भी हर जगह एक जैसी ही है.

रविवार को एशिया कप मे पाकिस्तान ने क्रिकेट के मैदान पर भारत से मुंह की खाई और उसी वक्त पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर में माहौल तनावपूर्ण हो गया. वैसे तो आज शटरडाउन और चक्का जाम आंदोलन होना था लेकिन इससे पहले ही यहां हालात गरम होने लगे. स्थिति ये आ गई कि पाकिस्तान सरकार ने पूरे इलाके में भारी सुरक्षा बल तैनात कर दिए हैं और आधी रात से ही इंटरनेट सेवाएं बंद कर दी गईं ताकि लोग एक जगह पर इकट्ठा न हो सकें.

क्यों भड़का PoK में गुस्सा?

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर को पाकिसतान वैसे को किसी ट्रॉफी की तरह डिस्प्ले करता है लेकिन सच ये है कि वहां के लोगों में पाकिस्तानी सरकार और सिस्टम को लेकर बगावती सुर रहे हैं. इस वक्त पाकिस्तान में बसे कश्मीरी शरणार्थियों के लिए सुरक्षित रखी गई 12 विधानसभा सीटों को खत्म करने, हाइड्रोपावर समझौतों की दोबारा समीक्षा, महंगाई और आटे पर सब्सिडी और बिजली की दरों को स्थानीय उत्पादन लागत से जोड़ने को लेकर वहां के लोगों में खासा गुस्सा है. यहां अवामी एक्शन कमेटी नाम के एक नागरिक समाज गठबंधन के जरिये इन मुद्दों को उठाया जा रहा है. ये गठबंधन हाल के महीनों में इस इलाके में काफी लोकप्रिय हुआ है और और अपने बैनर के नीचे हजारों लोगों को एकजुट भी किया है.
PoK से बाहर रहने वाले समुदाय, खासकर अमेरिका, ब्रिटेन और यूरोप में बसे लोग भी प्रदर्शन करने की तैयारी में हैं ताकि उनकी चिंताएं अंतरराष्ट्रीय स्तर तक पहुंच सकें. ये लोग चाहते हैं कि पाकिस्तानी सरकार की ओर से जो वादे किए हैं, उन्हें पूरा किया जाए लेकिन सरकार की ओर से शक्ति प्रदर्शन के अलावा कुछ नहीं हो रहा. प्रदर्शन के डर से पाकिस्तानी फौज पीओके में फ्लैग मार्च कर रही है और हर वो कोशिश कर रही है कि भीड़ इकट्ठा न हो. पाकिस्तानी सरकार और सेना को अब डर है कि ये आंदोलन आगे चलकर बगावत और आजादी की मांग में न बदल जाए.